शब्दवाणी *शब्द 1.* *ओउम गुरु चीन्हों गुरु चिन्ह पुरोहीत, गुरु मुख धर्म बखाणी । जो गुरु होय वा सहज शीले शब्दे नादे वादे, तिहिं गुरु का अलिंकार पिछाणी । छ्व दरशण जिहिं कै रुपण थापण, संसार बरतण निज कर थरप्या, सो गुरु प्रत्यज्ञ जांणी । जिहिं कै खर तर गोठ निरोतर बाचा, रहिय रुद्र समाणी । गुरु आप संतोषी अवरांपोषी, तत्त्वमहा रसबाणि । के के अलियाबासण होत हुताशण तामै तीर दुहीजुं । रसुवन गोरस घीयन लीयुं, तहां दुध न पाणी । गुरु ध्याइ- येरे ज्ञानी । तोड्त मोहा अति षुरसांणी, छीजल लोहा । पाणी छ्ल तेरी खाल पखाला, सतगुरु तोडे मन का साला । सतगुरु है तो सहज पिछाणी, कॄष्ण चरित्र विन काचै करवै रह्यो न रहसी पाणी ।। 1 ।। **शब्द 2.** ओउम मोरे छायान माया लोह न मांसु । रक्तुं न धातुं । मोरे माई न बापुं । रोही न रांपु । को न कलापुं । दुख; न सरापुं । लोंई अलोई । तयुंह त्रुलाइ । ऐसा न कोई । जपां भी सोई । जिहीं जपे आवागवण न होई । मोरी आद न जाणत । महियल धुं वा बखाणत । उरखडा- कले तॄसुलुं । आद अनाद तो हम रचीलो, हमे सिरजीलो सैकोण । म्हे जोगी कै भोगी कै अल्प अहारी । ज्ञानी कै ध्यानी, कै निज कर...